हमारे समाज और संस्कृति से जुड़े हुए अभी भी ऐसे बहुत-से मुद्दे हैं जिन्हें स्त्री-विमर्श के दायरे में शामिल नहीं किया गया है या जिनपर चर्चा नहीं की गयी है. हमारे समय की अत्यन्त सजग और सुपरिचित लेखिका अनामिका की पुस्तक ‘स्त्री-विमर्श का लोकपक्ष’ ऐसे ही कई पहलुओं को बहस का मुद्दा बनाती है जिनसे सामान्यतः हम कतरा कर निकल जाते हैं. आज स्त्री की अभिव्यक्ति और स्वतन्त्रता की राह में जितनी समस्याएँ हैं उसी अनुपात में स्त्रियों की दुनिया भी बहुत तेजी से बड़ी हो रही है. इस पुस्तक में संकलित निबन्ध को पढ़ते हुए यह अहसास होता है कि आज स्त्रियों के घर और आँगन का ही स्पेस नहीं बढ़ा है, बल्कि उसकी भाषा और विचार का, उसके सोच और दर्शन का व्योम खुलता गया है. उसके लोक और शास्त्र का दायरा भी तेज गति से बढ़ता गया है.