हिंदी सिनेमा की यह इतिहास कथा दशक -दर- दशक उसमें आए बदलावों और नई प्रवृत्तियों का लेखा-जोखा है. कथावस्तु और फिल्मांकन से लेकर अपनी समग्र प्रस्तुति तक हिंदी फिल्मों ने जो मुकाम तय किए उनका रोचक विवरण यहां दर्ज है. यह एक तरह से बीसवीं सदी के भारत की भाव-कथा भी है उसके अंतर्जगत का सूक्ष्म और कलात्मक अंकन भारत जैसे-जैसे बदला, वैसे-वैसे परदे पर उसकी छवि भी बदलती गई. निस्संदेह हिंदी सिनेमा अपने समाज का दर्पण है उसके - मनोभावों, स्वप्नों और अंतर्लोक की छवियां ही परदे पर तरह-तरह से उतरती रही हैं. देवदास इस इतिहास का एक छोर है तो भुवनशोम दूसरा किनारा. - पुस्तक में हिंदी सिनेमा की इस विकास-यात्रा को बहुत रोचक व रचनात्मक अंदाज़ में प्रस्तुत किया गया है.